Wednesday, 4 March 2015

होली है भई होली है

होली है भई होली है।
देख दृश्य टीवी पर होली के,
दादा जी हुरियाय गये
कर बातें याद अतीत की-
मन ही मन मुस्काय गये। 
उठे हुमक कर घोल रंग चुपके से,
दादी के ऊपर दियौ डाल।
और अंक में भरकर उनके-
मुख पर मल दियौ गुलाल। 
दादी के गाल हो गये लाल, 
बड़े जोर से हाँक लगाई होली है भई होली है ....होली है भई ...।
आँख तरेर दादी बोलीं,
ज्यों बन्दूक से निकली गोली। 
लाज नही आती है तुमको,
करते इस उम्र में ठिठोली।  
नशा हिरन हुआ दादाजी का गई बेकार भंग की गोली,
गर्दन झुकाय मिमियाये दादाजी होली है भई होली है ....होली है भई ....।
रोष भरी दादी अम्मा,
भूखी बाघिन सी लाग रहीं
ज्यों चूहे को बिल्ली देखे,
दादाजी को ताक रहीं। 
नहीं गुस्से का कोई ओर छोर,
चुपके से रंग लाई घोर। 
डाल रंग सिर के ऊपर से-
कर दिया दादाजी को सराबोर। 
हकबकाय गये दादाजी उठ बैठे लगाइ जोर,
हौले से मुस्काई दादीजी, प्रेम से बोलीं होली है भई होली है....होली है भई.. ।

जयन्ती प्रसाद शर्मा



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