Wednesday, 31 December 2014

आ गया नव वर्ष

आ गया नव वर्ष 

आ गया नव वर्ष।
प्रियवर आपको शुभकामना,
हम देते हैं सहर्ष।
      शुभ-सुख, चैन की वृष्टि होती रहे,
      धन धान्य की वृद्धि होती रहे।
है यह मंगल कामना हमारी,
आपका होता रहे उत्कर्ष.....आगया..................।
      नव वर्ष लाये आपके जीवन में बहार,
      होता रहे सम्मान गले में पड़ते रहें फूलों के हार।
स्थायित्व आप पा जायें,
नहीं रहें तदर्थ..............आ गया......................।
      पूर्ण होता रहे मनोरथ आपका,
      सफल होता रहे श्रम आपका।
हों फलीभूत आपके प्रयास,
जायें नहीं व्यर्थ............आ गया..................... ।
      आप सदा सर्वदा रहें सुखी,
      मिलती रहे आपको ख़ुशी।
दुख नहीं फटके पास आपके
नहीं होवे कोई अनर्थ।



जयन्ती प्रसाद शर्मा


             

Sunday, 28 December 2014

आपका दिल हमारे पास है

आपका दिल हमारे पास है।
छिपा रखा है हमने उसे अपने दिल में।
मेरा यह दिल अति सुरक्षित है-
प्यारी प्यारी मूल्यवान वस्तुयें रखने के लिये।
नयनों की निगाहवानी से रक्षित मेरे दिल में-
नहीं संभव है किसी दुर्मति दुर्मना का सहज प्रवेश,
इसीलिये कुछ लोग मुझे संग दिल मानते हैं।
यह अन्दर से अति कोमल है।
मैं विश्वास दिलाता हूँ आपका दिल वहां रहेगा-
पुर सुकून।
वहां रहतीं हैं मेरी कोमल भावनायें भी।
उनके साथ वह कर सकता है अठखेलियां-
और भर सकता है उडान।
निवेदन है,मेरी इन सुकोमल भावनाओं से-
आपका दिल ना खेले कोई खेल।
वे इतनी कोमल हैं तनिक सी ठेस लगने से-
मर जायेंगी।
मेरा नर्म दिल भी सह ना सकेगा आघात,
टूट जायेगा और बिखर जायेगा वह।
मै टूटे और बिखरे दिल के साथ कितना जी सकूँगा-
यह आपके विचार का विषय है।

जयन्ती प्रसाद शर्मा     

Thursday, 18 December 2014

आतंकबाद मुर्दाबाद

लाशों के ढेर पर खड़ा हुआ वह मना रहा था जश्न,
खून का लाल रंग उसे दे रहा था सुकून।
वह कभी मुस्कुराता था, करता था जोर से अट्टहास।
नफरत से आँखें उसकी सिकुड़ जातीं थीं,
और कभी खुशी से चमक जाती थी-
हजार वाट के बल्ब की तरह।
कभी किसी शव को मारता था ठोकर,
और कभी किसी लाश को रौंद देता था।
वह कर रहा था अपना भरपूर मनोरंजन।
एक मासूम के शव को टांग लिया उसने संगीन पर-
और करने लगा अट्टहास।
अचानक उसे लगा बच्चे की शक्ल है-
कुछ जानी सी, पहचानी सी-
और लगा उसे गौर से देखने।
उसका थम गया अट्टहास, जाग उठीं संवेदनायें-
और बुझ गये आँखों के बल्ब,
बहने लगा आँसुओं का सैलाब-
क्योंकि वह उसका ही लख्ते-जिगर था।
लरजती आवाज में वह लगाने लगा बेसाख्ता नारे-
आतंकबाद मुर्दाबाद, आतंकबाद मुर्दाबाद।

जयन्ती प्रसाद शर्मा

Saturday, 13 December 2014

मुझको यारो माफ करना


मुझको यारो माफ करना मैं नशे में हूँ,
होश में मुझको न लाना मैं मजे में हूँ।
दीन दुनिया की नहीं मुझको खबर,
अह्सासे दर्द से हूँ बेखबर।
कोई कहता है क्या, हूँ इससे बेअसर,
मै हूँ उसकी राह में, मंजिल पर मेरी नजर।
प्रेम रस मैंने पिया है, प्रिय उसे मैं हूँ..........मुझको यारो .......।
हर साँस मेरी है उसकी अमानत,
न बरदास्त मुझको कोई करे उसमें खयानत।
मन में मेरे गहरे गड़ी है उसकी मूरत,
नयनों में बस गई है उसकी सूरत।
खयालों में मेरे है वह, मैं खयालों में उसके हूँ......मुझको यारो ...।

जयन्ती प्रसाद शर्मा  

  

Saturday, 6 December 2014

गंगा महात्यम (गंगा आरती)

गंगा माता मोक्ष दायिनी,
भक्ति मुझे दो अनपायिनी। 
नहीं साधारण, तेरा जल है गंगाजल,
मज्जन कर जो करें आचमन-
उनको तू दे देती अमित फल। 
कलुष तन मन का तू हर लेती,
निर्मल सर्वजनों को कर देती।
रोग शोक को दूर भगाती,
पाप नाशिनी तू कहलाती। 
जय तेरी माँ मुक्तिदायिनी................................. गंगा माता..................... ।
श्री विष्णु का तू चरणोदक,
जग कल्याण को तो उद्धत।
छोड़ स्वर्ग धरा पर आई,
रोका वेग तेरा श्री शिव ने-
जटा में उनकी तू समाई।
करी विनय जब भागीरथ ने,
पुनि धरती पर माँ गंगे आई।
जय माँ गंगे निर्माल्य दायिनी................................गंगा माता.................।
जीवनाधार तू भारत भू का,
हमको है वरदान प्रभु का।
तेरे बिन कुछ भी नहीं पूरा,
भारत का चित्र चरित्र अधूरा।
सदियों से बहती अविरल धारा-
इस धरती को सिंचित करती है,
होता पैदा प्रचुर धान्य-
तू क्षुधा हमारी हरती है।
जय जय माँ धन धान्य दायिनी................................. गंगा माता...................।

जयन्ती प्रसाद शर्मा